19 सितंबर, 2025 को व्हाइट हाउस के ओवल ऑफिस में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक महत्वपूर्ण कार्यकारी आदेश (एक्जीक्यूटिव ऑर्डर) पर हस्ताक्षर किए, जिसमें एच-1बी वीजा आवेदनों के लिए प्रतिवर्ष 100,000 डॉलर (लगभग 84 लाख रुपये) का नया शुल्क लगाया गया है। यह कदम अमेरिकी आप्रवासन नीति में एक बड़ा बदलाव है, जो मुख्य रूप से उच्च कुशल विदेशी श्रमिकों को लक्षित करता है। एच-1बी वीजा कार्यक्रम, जो विशेषज्ञता वाले क्षेत्रों जैसे आईटी, इंजीनियरिंग, चिकित्सा और शिक्षा में विदेशी पेशेवरों को तीन से छह वर्ष के लिए अमेरिका लाने की अनुमति देता है, अब कंपनियों के लिए काफी महंगा हो गया है। इस आदेश का उद्देश्य अमेरिकी श्रमिकों की रक्षा करना और वीजा कार्यक्रम के दुरुपयोग को रोकना बताया जा रहा है।एच-1बी वीजा कार्यक्रम की पृष्ठभूमि को समझना आवश्यक है। यह कार्यक्रम 1990 के आप्रवासन अधिनियम के तहत स्थापित किया गया था, जो अमेरिकी कंपनियों को ऐसे विदेशी विशेषज्ञों को नियुक्त करने की अनुमति देता है जिन्हें स्थानीय स्तर पर उपलब्ध न हो। प्रति वर्ष 85,000 वीजा जारी किए जाते हैं—65,000 सामान्य और 20,000 अमेरिकी विश्वविद्यालयों से उच्च डिग्री प्राप्त करने वालों के लिए। लॉटरी सिस्टम के माध्यम से चयन होता है, और वर्तमान में आवेदन शुल्क कुछ हजार डॉलर तक सीमित है। लेकिन ट्रंप प्रशासन का कहना है कि यह कार्यक्रम अमेरिकी श्रमिकों के लिए खतरा बन गया है। व्हाइट हाउस के फैक्ट शीट के अनुसार, 2025 के वित्तीय वर्ष में एक कंपनी को 5,189 एच-1बी वीजा स्वीकृत हुए, जबकि उसी दौरान 16,000 अमेरिकी कर्मचारियों की छंटनी की गई। इसी तरह, दूसरी कंपनी ने 1,698 वीजा प्राप्त किए लेकिन 2,400 अमेरिकी नौकरियों समाप्त कीं। ट्रंप ने कहा, "यह कार्यक्रम अमेरिकी श्रमिकों को विस्थापित कर रहा है, और हम इसे रोकेंगे।"इस आदेश के तहत, कंपनियों को प्रत्येक एच-1बी वीजा के लिए वार्षिक 100,000 डॉलर का शुल्क देना होगा, जो वीजा की अवधि (तीन वर्ष) में कुल 300,000 डॉलर तक पहुंच सकता है। वाणिज्य मंत्री हॉवर्ड लुटनिक ने संवाददाताओं को बताया कि यह शुल्क "वीजा दुरुपयोग को रोकने और अमेरिकी खजाने में 100 अरब डॉलर से अधिक राजस्व जुटाने" के लिए है। ट्रंप ने दावा किया कि इस राशि से करों में कटौती और कर्ज चुकाने में मदद मिलेगी। साथ ही, उन्होंने एक और आदेश पर हस्ताक्षर किए, जिसके तहत "ट्रंप गोल्ड कार्ड" नामक नया वीजा कार्यक्रम शुरू किया गया। इसमें धनी विदेशी व्यक्ति 1 मिलियन डॉलर (लगभग 8.4 करोड़ रुपये) देकर अमेरिकी वीजा प्राप्त कर सकते हैं, जबकि नियोक्ता 2 मिलियन डॉलर देकर प्रायोजन कर सकते हैं। एक "प्लेटिनम कार्ड" की भी योजना है, जो 5 मिलियन डॉलर में 270 दिनों की अमेरिकी यात्रा की अनुमति देगा, बिना अमेरिकी आय पर कर के।यह कदम अमेरिकी टेक उद्योग के लिए बड़ा झटका है, जो एच-1बी पर भारी निर्भर है। 2025 की पहली छमाही में अमेज़न को 12,000 से अधिक, माइक्रोसॉफ्ट और मेटा को 5,000 से अधिक वीजा स्वीकृत हुए। लगभग दो-तिहाई एच-1बी नौकरियां कंप्यूटर से संबंधित हैं, और भारत व चीन से आने वाले पेशेवरों की संख्या सबसे अधिक है। भारतीय मूल की टेक कंपनियां कुल वीजों का एक-पांचवां हिस्सा प्राप्त करती हैं। द हिंदू के अनुसार, यह भारतीय पेशेवरों को प्रभावित करेगा, जो पहले से ही ग्रीन कार्ड के लिए दशकों इंतजार कर रहे हैं। कंपनियां अब शुल्क वहन करने में असमर्थ हो सकती हैं, जिससे वीजा नवीकरण प्रभावित होगा।प्रतिक्रियाएं तीखी हैं। टेक लॉबी और आप्रवासन विशेषज्ञों ने प्रशासन की वैधानिक शक्तियों पर सवाल उठाए हैं। वर्तमान कानून केवल प्रोसेसिंग लागत वसूलने की अनुमति देता है, न कि इतना अधिक शुल्क। गार्जियन और रॉयटर्स के अनुसार, यह अमेरिकी नवाचार को नुकसान पहुंचा सकता है। ट्रंप समर्थक इसे "अमेरिका फर्स्ट" नीति का हिस्सा मानते हैं, जो मजदूरी दबाने और अमेरिकी नौकरियों की रक्षा करता है। कानूनी चुनौतियां अपेक्षित हैं, लेकिन ट्रंप ने कहा, "टेक कंपनियां खुश होंगी।"कुल मिलाकर, यह आदेश आप्रवासन बहस को नई ऊंचाई देगा। वैश्विक प्रतिभा प्रवाह बाधित हो सकता है, जबकि धनी निवेशकों के लिए रास्ता आसान।